पश्चिम बंगाल उपचुनाव में हार के बाद भी भजपा के लिए शुभ संकेत है यह चुनाव परिणाम।

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लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की 18 सीटें जीतकर ममता बेनर्जी की कुर्सी हिलानें वाली भाजपा को कुछ दिन पूर्व हुए तीन विधानसभा उप चुनाव में हार का मुह देखना पड़ा है। हालाकि भाजपा के लिए राहत की खबर यह हो सकती है कि उसे पिछली बार की तुलना में इस बार तिगुने वोट हासिल हुए हैं। यह भाजपा के बढतें हुए जनसमर्थन को बतानें के लिए काफी है।

गौरतलब है कि केंद्रीय मंत्री देवाश्री चौधरी और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष के क्षेत्र में भी पार्टी को हार को जरूर भाजपा के लिए झटका माना जा सकता है,लेकिन भाजपा को मिलें मतों पर गौर किया जाएं तों यह ममता बेनर्जी के लिए भाजपा के बढतें जनाधार का सूचक है। भाजपा  पिछली बार की तुलना में वोटों में भारी इजाफा कर दूसरे नंबर पर रही है। इस तरह भाजपा को बंगाल में ममता का विकल्प कहना अतिशोक्ति नहीं होगा। साफ है किे अगला विधानसभा चुनाव भाजपा और ममता बेनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के बीच होगा। पंश्चिम बंगाल में लंबे समय तक सत्ता में रहें कम्यूनिस्ट और कांग्रेस बंगाल में कही नहीं है।

कालियागंज और खड़गपुर में लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा को बढत हासिल थी। लेकिन उपचुनाव में उस बढत को भाजपा बरकरार नहीं रख सकी। भाजपा को आत्ममंथन और केडर से रिपोर्ट मांगनी होगी कि ऐसा क्या हुआ कि बढत बरकरार नहीं रह सकी।

कालियागंज विधानसभा सीट पर कांटे की लड़ाई के बाद मात्र 2,300 वोटों से भाजपा की हार हुई. यहां 2016 के विधानसभा चुनाव में महज 27 हजार वोट पाकर भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी, मगर इस बार उपचुनाव में तीन गुने से भी अधिक (95 हजार से अधिक) वोट मिले हैं.

इसी तरह करीमपुर विधानसभा सीट पर भी भाजपा अपने वोटों में भारी बढ़ोतरी करने में सफल रही है. पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में तीन गुना वोट बढ़े हैं. वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 23302 वोट मिले थे, जबकि तीन साल बाद हुए इस उपचुनाव में 78 हजार से ज्यादा वोट मिले.

पश्चिम बंगाल के भाजपा के नेता का मानना है कि तीनों सीटों पर हार के पीछे विरोधी वोटों का एकजुट होना है. लोकसभा चुनाव में भाजपा को 18 सीटें मिलने के बाद विपक्षी वोट एकजुट हो गए, जिससे वोट बढ़ने के बाद भी भाजपा सीट नहीं जीत सकी. मसलन, करीमपुर सीट पर तृणमूल कांग्रेस को पिछली बार से 10 हजार अधिक वोट मिले, जबकि भाजपा पिछली बार से 55 हजार अधिक वोट पाकर भी हार गई. इस सीट पर मार्क्सबवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के वोट भी तृणमूल के पाले में चले जाने की बात सामने आ रही. ऐसे में भाजपा सूत्र माकपा और तृणमूल के बीच सांठगांठ और दोस्ताना रिश्ते जैसे आरोप लगा रहे हैं.

भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के सचिव रितेश तिवारी का आकलन है कि “अक्सर उपचुनाव सत्तापक्ष की जीत होती है, क्योंकि पूरी मशीनरी विपक्ष के खिलाफ खड़ी रहती है. कालियागंज सीट पर सिर्फ दो हजार वोटों से ही सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस जीत पाई. इससे पता चलता है कि राज्य में विधानसभा चुनाव में भी जनता भाजपा की तरफ आशा भरी निगाहों से देख रही है.”कलियागंज सीट रायगंज लोकसभा क्षेत्र में आती है. इस संसदीय सीट में जनांकिकीय दृष्टि से देखा जाए तो मुस्लिम समुदाय की आबादी बहुमत में है फिर भी लोकसभा चुनाव में भाजपा की देबाश्री चौधरी जीत हासिल करने में कामयाब रही थीं.

पार्टी सूत्र बताते हैं कि लोकसभा चुनाव में माकपा और कांग्रेस के बीच मुस्लिम वोट बंट गया था. मगर इस बार विधानसभा चुनाव में कलियागंज सीट पर तृणमूल के जीतने के पीछे मुस्लिम व भाजपा विरोधी वोटों का एकजुट होना बताया जा रहा है.

साल 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का गढ़ मानी जाने वाली खड़गपुर सीट पर दिलीप घोष ने भाजपा को जीत दिलाई थी. मगर इस बार उपचुनाव में 20 हजार से अधिक वोटों से भाजपा की हार हुई है. जबकि लोकसभा चुनाव में भाजपा को इस विधानसभा क्षेत्र में करीब 45 हजार वोटों की बढ़त मिली थी. वहीं कालियागंज सीट पर भी भाजपा ने 55 हजार से ज्यादा की बढ़त बनाई थी.

साल 2016 में भाजपा के टिकट पर खड़गपुर विधानसभा सीट से जीते दिलीप घोष और करीमपुर से तृणमूल विधायक महुआ मित्रा के 2019 में सांसद बन जाने पर इन दोनों सीटों पर उपचुनाव हुआ. वहीं, कांग्रेस विधायक प्रमथनाथ राय के निधन के कारण कालियागंज सीट पर उपचुनाव कराना पड़ा.

भापजा की इस हार ने एक बार फिर बता दिया है कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बेनर्जी के सामनें भाजपा के पास अभी भी कोई विकल्प नहीं है। ममता के सामनें कौन का जवाब भाजपा को अपने स्थानीय संगठन से खोजना होगा और अगलें विधानसभा चुनाव के पहलें मतदाताओं को बताना होगा। फिलहाल भाजपा के सामनें ऐसा कोई चेहरा नहीं है जों ममता के कद के सामनें खडा होकर ममता को चुनौती दें सकें। पं​ बंगाल की लड़ाई भाजपा को पश्चिम बंगाल में ही लड़नी होगी। दिल्ली में नहीं। प्रधानमंत्री मोदी अच्छें प्रचारक हो सकते है,लेकिन मोदी का कद भी तभी काम करेंगा जब भाजपा के पास ऐसा कोई चेहरा हो,जो ममता को स्थानीय लेवल पर चुनौती दे सकें। दिल्ली में बैठें मोदी,बंगाल की ममता को हरा नहीं सकतें। उम्मीद है भाजपा पंश्चिम बंगाल में नेतृत्व के अभाव से उबर जाएंगी और ममता को चुनौती देनें की स्थिति में आ जाएंगी।

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