क्या राजस्थान में वसुंधरा राजे का विकल्प तलाश रही है भाजपा!

राजस्थान में लंबें समय तक भाजपा की पहचान और कद्दावर नेता रही पूर्व मुख्यमंत्री वसुधंरा राजें को भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व संघ की सहमति के बाद प्रदेश की राजनीति से बाहर करना चाहता है। भाजपा सूत्र बतातें है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया का राजस्थान में विकल्प तैयार करने में जुट गया है। मोदी और शाह के साथ संघ भी चाहता है कि आनें वालें दिनों में राजस्थान में ऐसा नेतृत्व तैयार किया जाए जो राजस्थान में पार्टी को 15 से 20 साल तक नेतृत्व दे सकें। वसुधरा राजें की उम्र 67 साल की है। मोदी और शाह की सक्रिय राजनीति की समय सीमा 75 साल के पास वसुधरा पहुच रही है। अभी चार साल राजस्थान में अशोंक गहलोत की सरकार है। चार साल बाद जब राजस्थान में विधानसभा चुनाव 2023 में होंगे और उस समय वसुधंरा राजें की उम्र 71 साल की हो जाएंगी। हालाकि 75 साल की समय सीमा के लिए वसुधरा के पास पूरे चार साल होगे लेकिन भाजपा और संघ वसुधरा को अब राज्य की राजनीति से रिटायर करनें का मन बना चुका है और नए नेतृत्व को खडा करने का मन बना चुका है। वसुंधरा को भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने वसुंधरा को संकेत दे दिए है। हालाकि वसुंधरा ने फिलहाल राजस्थान की राजनीति छोड़ने के संकेत नहीं दिए है और लगतार प्रदेश में सक्रिय रहकर अपनी उपस्थिति और अपनें मंसूबों से पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को अवगत करा रही है।
विपक्ष में रहकर जहा वसुंधरा अशोक गहलोत सरकार से दो दो हाथ कर रही है वही वह भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व से भी राजस्थान में वर्चस्व को लेकर संघर्ष कर रही है। सत्ता में रहतें हुए भी अपने दोनों कार्यकाल 2003 से 2008 और 2013 से 2018 के बीच वसुंधरा के सरकार चलानें की शैली से संघ और भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व असहज रहा था। राजे का पिछला पूरा कार्यकाल (2013-18) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह से तनातनी के बीच ही बीता। सियासी गलियारों में वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की चर्चा दिल्ली से राजस्थान तक अक्सर होती थी। लेकिन विधायकों पर उनकी पकड़ और गडकरी और जेटली जैसे दिग्गज नेताओं के सहारें वसुंधरा सत्ता बचानें में कामयाब रही। अब केन्द्र में गडकरी बेहद कमजोर हो चुके है और जेटली इस दुनिया में नहीं है ऐसें में वसु्ंधरा को दिल्ली के किसी दिग्गज नेता का समर्थन भी ऐसा नहीं जो चट्टान के समान वसुंधरा के पीछें खडा हों सकें।
भाजपा के एक बडें नेता का आकलन है कि यदि वसुंधरा 2018 में विधानसभा जीत जाती तो मोदी और शाह मजबूरी में वसुंधरा कों मुख्यमंत्री बनातें और वसुंधरा फिर से प्रदेश में जम जाती,लेकिन हार ने वसुंधरा की राह अब मुश्किल कर दी। उदाहरण के लिए भाजपा के केन्द्रीय नेता येदियुरप्पा का उदाहरण देतें हुए कहतें है कि जैसे मोदी और शाह की पंसद न होनें के बाद भी भाजपा को मजबूरी में कर्नाटक की कमान येदियुरप्पा को सौपना पड़ी। वैसी ही स्थिति राजस्थान में होती यदि वसुंधरा जीत जाती।
राजस्थान में जिन नेताओं को राजे की विरासर सौपनें के लिए तैयार किया जा सकता है,उसमें सबसें पहला नाम मोदी सरकार में केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत का लिया जा सकता है। शेखावत भी राजपूत है। पढे लिखें है। संघ की पंसद भी है और ईमानदार होने के साथ साथ छवि भी बेहद साफ सूथरी है। मोदी सरकार में उनका प्रदर्शन शानदार रहा है। शेखावत के अलावा जयपुर के पूर्व राजघराने से आने वाली सांसद दिया कुमारी का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। इस बारे में राजस्थान भाजपा के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘पूर्व मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत के बाद से राजस्थान में राजपूत मुख्यमंत्री की सहज स्वीकार्यता आज भी महसूस की जा सकती है. ख़ुद राजे भी मराठा राजघराने से आने के बावजूद ख़ुद को राजपूत की बेटी बताकर ही यहां स्थापित हो पाई थीं.’
भाजपा के राष्ट्रीय नेता का कहना है कि तो पिछले लोकसभा चुनाव में दिया कुमारी को राजसमंद से टिकट दिलवाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ शाह और मोदी ने बडी भूमिका निभाई थी। वसुंधरा, दिया कुमारी को टिकट देना नहीं चाहती थी। वसुंधरा ने ही 2018 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में दिया कुमारी का टिकट काट दिया था। तब वे सवाई माधोपुर से विधायक थीं। राजस्थान के एक नेता का कहना है कि वसुंधरा हमेंशा दिया कुमारी को प्रतिद्धद्धि के रूप में देखती रही और दिया का कद कम करनें की कोशिश करती रही।
लेकिन भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व के साथ साथ संघ भी इस बात का समझता है कि वसुंधरा को आसानी से प्रदेश से बाहर नहीे करा जा सकता। वसुंधरा जिद्दी है और पार्टी के विधायकों के एक वर्ग में उनकी पकड़ है। प्रदेश की आज भी वे सबसे बड़ी नेता है। वसुधंरा का विकल्प भाजपा का नेतृत्व वसुंधरा के सहमति से ही तय करेगा तो राजस्थान भाजपा के लिए बेहतर होगा। वसुंधरा राजस्थान की येदियुरप्पा है। जैसे कर्नाटक में येदियुरप्पा तमााम भ्रष्ट्राचार के आरोपों के बाद भी भाजपा के लिए मजबूरी और जरूरी है वैसे ही वसुंधरा भी राजस्थान में भाजपा के लिए फिलहाल मजबूरी और जरूरी है।
वसुंधरा को खारिज करना भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व के लिए आसान नहीं होगा। लेकिन भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने राजस्थान में नया नेतृत्व तैयार करने का मन बना लिया है।

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