अध्यात्म और विज्ञान से मिलकर ही जीवन बनता है – डॉ. मोहन भागवत

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नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि सेवा कार्य के लिए संघ और जैन आज पहली बार इकट्ठा आए होंगे, लेकिन संघ और जैन समुदाय के संतों द्वारा संचालित सेवा कार्यों का बहुत पुराना संबंध है, यह आज भी चल रहा है. आचार्य तुलसी और द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी का घनिष्ठ संबंध था. इन दोनों के बीच मिलने-जुलने का कार्य चलता आ रहा है और आज भी चल रहा है. सेवा कार्य में जाति-पाति, पंथ-संप्रदाय, पार्टी आदि नहीं देखना चाहिए. सभी को सहभागी होना चाहिए. जैन संप्रदाय की एक विशेषता है कि उनके आचार्यों की तपस्या जैसी कठिन तपस्या का साध्य दूसरा कोई नहीं है. आचार्य विद्यासागर महाराज इतनी ठंड में पैदल चलकर आते हैं. मैं उनसे मिलने गया तो उन्होंने बताया कि जो लोग जेल में हैं, उनको वो स्वरोजगार सिखाते हैं ताकि बाहर जाकर इनके मन अपराध मुक्त हों. और समाज में विश्वासपूर्वक अपनी जिंदगी फिर से जी सकें. सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार स्मारक न्यास तथा भगवान महावीर रिलीफ़ फाउंडेशन ट्रस्ट द्वारा जसोला, नई दिल्ली में संचालित मेडी डायलिसिस सेंटर के उद्घाटन समारोह में संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि इस अच्छे कार्य में संघ आपकी मदद करेगा. स्वाभाविक रूप से अच्छे काम में एक व्यक्ति हाथ लगा रहा है तो उसमें सबको हाथ लगाना चाहिए, क्योंकि सेवा मनुष्य के मनुष्यता की सहज अभिव्यक्ति है, वो कोई बड़ा तीर मार रहा है ऐसा नहीं है. मनुष्य इसलिए मनुष्य है कि वो दुःखितों की सेवा करता है. पशु भी करते हैं, लेकिन वो अपनी सुविधा से करते हैं. मनुष्य अपनी सुविधा से नहीं करता है, जब उसे दुःख-दर्द दिखता है तो उससे रहा नहीं जाता इसलिए वो मनुष्य है. सेवा का काम बहुत स्वाभाविक काम है, उसे स्वाभाविक पूर्ति से ही करना चाहिए.

सरसंघचालक जी ने कहा कि आजकल लोग सेवा को पहले सर्विस कहते हैं, फिर सेवा कहते हैं. जबकि सेवा और सर्विस दोनों का अलग-अलग अर्थ है. सर्विस के कई भाव होते हैं. सरकार की तरफ से सरकारी सर्विस होती है, जिसमें वेतन मिलता है, रिटायर होते हैं तो पेंशन मिलती है. लेकिन सेवा में कुछ नहीं मिलता है. सेवा निःस्वार्थ होती है, जो मनुष्य के मन से निकलती है. यह एक संवेदना है, उस संवेदना से हम जिसकी सेवा करते हैं उसके दुःख को समझते हैं और फिर उसका निवारण करते हैं.

हम लोग एकता की विविधता को जानने वाले हैं. विज्ञान और अध्यात्म अलग हैं, ये मानना ही गलत है. प्रयोगों से ही अध्यात्म निकला है. हमारे यहां जितने भी आध्यात्मिक संप्रदाय हैं, वहां प्रत्यक्ष साधना करके अंतिम परिणीति तक जाकर अपने अनुभव को बताने वाले लोग हैं. तब भी थे और आज भी हैं जो आंखों देखी बताते हैं क्योंकि प्रयोग, निरीक्षण और उसका अनुभव किए बिना सत्य नहीं माना जाता है. इसलिए यहां उसका प्रत्यक्ष प्रयोग होता है. अगर उस ढंग से चला जाए तो आज भी विज्ञान अपना चमत्कार दिखा सकता है और अध्यात्म भी चमत्कार दिखा सकता है. दोनों को झगड़ा करने की जरूररत ही नहीं है क्योंकि दोनों से मिलकर जीवन बनता है. द्वैत की प्रकृति से जाना ही जाना है, फिर अद्वैत को पाना, इन दोनों का संतुलन साधने वाला हमारा देश है. इसलिए भारत जीवन का मार्ग बताने वाला अकेला देश है. हमारे यहां उपासना का मार्ग है पंथ-संप्रदाय. जिसे हम कहते हैं ये जैन है, बौद्ध है, हिन्दू है. धर्म से कुछ कम हमको स्वीकार नहीं होता है क्योंकि ये ही जीवन का तरीका बताता है. भौतिक जगत से गुजरते हुए कैसे आध्यात्मिक सत्य को पाना है. इस सत्य को टाल नहीं सकते, इसमें आपको जाना ही होगा. शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा एक साथ कैसे विकसित होना, ये हमारे जीवन का तरीका है. इसी के आधार पर व्यवस्थाएं बनती हैं. इन सबको जब तक हम भारत में यशस्वी नहीं करते हैं, तब-तक दुनिया को क्या बताएंगे? भौतिक विज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान को एक साथ चला कर दुनिया को हमें दिखाना होगा. जिसकी शुरूआत आज यहां से हुई है, ये बहुत सार्थक कार्य है. इस कार्य में मन, धन, तन से सबको लगना चाहिए.

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